Sunday, 12 March 2017

बंजारा की दास्ताँ

बंजारा की दास्ताँ


इस सर ज़मी पर, बंजारों के चलन से,
रूबरू है वतन।
आज़ाद पंख लिये,चले और कही और।
लापरवाह सा मंज़र,जाना था अब कही और।

कुदरत से  बेख़ौफ़, इंसान ,
 इंसानियत की I
कौन  है   वो ,    दे  डालता ,
पीढ़ी-दर पीढ़ी को ,हर रात की मौत।
अपने ही मुल्क में थे, राहगुज़र,
 अनजान सड़कों पर I
जाती पहियों को ,ना दिन का चैन ,
ना रात की ख़बर, यूँ तो यह ज़मी
लिख चुकी हैं , कई दास्ताँ
 रक्त की , अब जाती पहियों की,
अपनी ही धुन ,अपना ही रास्ता।
गीतों का लय का ,एक नया अवरोह ,
बंज़ारों  के पहियो का एक नया मोड़
,अजनबी से रिश्तों का ,एक नया जोड़
बसती है बंजारों की बस्ती ,भोर होते ,
 बदलते रास्तों में ,सुना रहा ,
 एक बंजारा ,अपनी बीती ,
दास्तानों में।


()

ना जाने क्या क्या थे सहने।
नफरत की गर्म हवा ,
इस बर्फीली सेज़ पर ,
सुलग रही चिंगारियाँ,
मानव के इस पंजर बीच ,
आतंक के इस खेल में ,
ना जाने , क्या-क्या थे सहने।

लौट आने का वादा कर,
क्यों सो चुके वो ,
खामोशी की चादर ओढ़कर ,
बंद द्वार के दरार से ,
छिपी , सहमी दृष्टि ,
दूर तक ढूँढ रही , बन मृगतृष्णा।
अपनों की तलाश में,
ना जाने क्या- क्या थे सहने।

गूँज उठी थी वादियाँ ,
बंदूकों और गोलियाँ ,
बाँध रही, धमाको का समां ,
तांडव करती दीवाली ,
होली भी खूब झूम रही ,
लगा रक्त की लालिमा।
रक्त के खेल में ,

ना जाने , क्या-क्या थे सहने।

लश्कर है धुआँ का ,
समेट  लेने को है आतुर ,
हर इंसान का , अस्तित्व
निगलने लेने को है आतुर ,
नई पीढ़ी का व्यक्तिव ,
छिपा कही मासूम ,
सहमा सा, काँपता , देखता ,
धुंधलाता , हुक्कों का धुआँ ,
मिटते इस युग में ,
ना जाने क्या-क्या थे सहने।

गली-गली भागता ,
इमरान, इमरान ढूंढता ,
ठिठक उठे उसके
कदम , देख बंदूकधारी ,
आता अपनी ओर ,
एक कड़क जवान ,
साँसों की घूँट , छोटी-छोटी सी ,
कमज़ोर , वाष्पित होती ,
वो स्वर नन्ही-नन्ही सी ,
खो गया बर्फीली वादियों में ,
टूट गया वो तंज समां ,
अकस्मात् धमाके से,
मूक बद्ध सा नज़ारा था ,
जलता मकान, प्यारा था।
खींच लिया माँ ने ,
अपनी बांहो में समेट ,
बरसती उनकी आँखों को ,
ना जाने क्या- क्या थे सहने।
खानाबदोश सी ज़िन्दगी
का अब था आगाज़ ,
उड़ते पंछी का ,
पंख , परवाज़ ,
एक जुबां के बोलनेवाले ,
मिल बाँट के रहनेवाले ,
राउफ में साथ झूमने वाले ,
रो रो करते आज बयान ,
क्यों फर्क हममे आया ,
आज ही क्यों ?
हिन्दू और मुसलमान ?
कह कह बंजारा
फफ़क पड़ा ,
पहिये हौले हौले चल पड़ा ,
देखता छूटता आँगन को
खामोश सी बढ़ रही रात ,
ना शहनाई , ना बारात ,
ना कोई ताल , ना तैयारी ,
हिलता पहिया , हौले हौले ,
देता गीले नैनों को ,
हलकी सी मीठी ख़ुमारी।
ज़मी अपनी ,माटी अपनी ,


ज़मी अपनी ,माटी अपनी ,
कौन कर गया , फैसला ,
ह्रदय के दो टुकड़े करने का  ,
फरिश्तों का रूप ले आई ,
कूटनीतिज्ञ और राजनीति ,
बंजारा गा गा विफर रहा ,
चाहे हिन्दू हों या मुसलमान ,
ना तुम रहोगे आज़ाद ,
ना हम होंगे मेहमान।
इस बोझिल पल में ,
ज़ख़्मी ह्रदय को ना जाने ,
क्या- क्या थे सहने।
()
 निकल रहा , पूर्व में रवि ,
अपनों के झगड़ों में ,बन रही
बिगड़ती-बनती छवि ,
निकल आये नए शहर ओर ,
इंसानियत की ये कहानी ,
गूंज उठी , हर दिशा -छोर ,
असमंजस में राहगीर ,
देख आता कारवाँ अपनी ओर,
अजनबी से , शहर के दहलीज़ ,
ना कोई यहाँ था अज़ीज़ ,
मुट्ठी में अब नए युग का भोर ,
छुप रहा स्वय , भोली प्रश्नों से ,
अटपटाता पाता, छटपटाता  सा ,
दहकते अंगारों को आरपार कर ,
भूल नहीं पा रहा था , अभी
चीख पुकार और वो डर।
घूरती यहाँ भी हैं ,
कई अनजान आँखें ,
बातों में था किस्सा ,
गली, चौबारा , बाज़ार पर ,
हम कह कह ना थकते ,
अपने दिल का हाल ,
वो सुन बढ़ जाते आगे ,
मानो मूक शब्द कह रहे ,
भागकर क्या किया कमाल।
बदलते नए मौहोल में ,
ना जाने क्या-क्या थे सहने।
कौन समझ सका है यहाँ
ज़ख़्मी का दर्द बयाँ
नयी ज़मी थी , नया डेरा ,
अनजान शहरों में बसेरा ,
हर रात ले आती ,
एक नया सवेरा ,
इस जग में क्या हुआ है , कोई अपना ?
समझ सका है कोई , किसी की वेदना ?
हुआ है कभी , मेरी आँखों की पीड़ा
थी अजनबी की आँखें रोई ?
कह बंजारा , की दुःखती रग रोई ,
भाग आये हम मिलकर सब ,
ताना तीर दुर्योधन ने जब ,
शरण ढूँढा हमने यहाँ
जब सरकार बानी हमारी रब ,
पांडवों ने भी तो अज्ञातवास ,
बीहड़ वन में काटी ,
रो रो कहती हमसे आज
अपनी कश्मीर की घाटी।
सौ बात में एक सच्चाई ,
बिन कृष्ण , यह कौम ,
अर्जुन ना बन पायी ,
अरे ! शकुनि ने भी , भूमिका खूब निभाई।
सारथि कोई और नहीं , राजनीती थी
महाभारत कलयुग में फिर आई।
राजनीति के इस खेल में,
 ना जाने क्या- क्या थे सहने।

दरिया के तीर बसनेवाले ,
बेफिक्र सी नींद लेनेवाले ,
किसने आँका था , कीमत खून पसीने की ,
किसने सीख था कला जीने की ,
मँडरा रहे माथे पर ,
कई प्रश्न चिंन्ह ,
जी रहा ये बंजारा
एक-एक दिन गिन-गिन।
रोटी यहां कमाना है ,
धक्कों का कौर ही खाना है ,
वक्त है बड़ा बलवान ,
बनाना है अपनी पहचान।
ना हमें मिलेगा  वो शिकारा, वो बाहर ,
ना केसर , ना फूलों के कतार ,
मिलेंगी यहाँ छोटी छोटी क्यारियाँ
छोटे कमरों में , तन्हाई की सवारियाँ ,
कड़वाहट के लेते घूँट को
ना जाने क्या- क्या थे सहने।

हुआ था तब भी चीर -हरण  ,
कबायलियों के आतंक में
ना कर पायी , कृष्ण का स्मरण
हुई थी द्रौपदी तब भी शर्मसार ,
अपने ही वतन के आँगन में ,
चीख है, एक दिन दब जायेगी ,
शकुनि की चाल है
कइयों के गर्दन कट जाएंगे।
कई बार ज़मी की छोर छटी,
हर बार की तरह भारत फिर बँटी ,
धर्म के तलवार से लगाए निशान ,
चाहे हों या पाक़िस्तान , हिन्दू
हो या मुसलमान।
सोच है उस भविष्य की
नफरत की आग में , झूलते बच्चों की ,
ये किस तरह के सपने सजायेंगे ,
गांधी पटेल क्या ये बन पाएंगे ?
कलम या बन्दूक उठाएंगे ,
शून्य में देखता बंजारा , कह डाला ,
ना जाने क्या- क्या है सहने।

(4)
दूर आसमाँ तक वह ताकता ,
अपनी आत्मा भीतर भी झाँकता ,
मायूसी से भीगे मन ,
स्वयं से ही पूछ डालता ,
आसमान तो एक जैसे ,
ज़मी में अंतर क्यों ?
इन्सां सभी , तो एक जैसे,
कहीं अज़ान कहीं मंदिर क्यों ?
गाता ये बंजारा ,
मायूस प्रश्नों से हारा ,
कहाँ है वो मखमली घास ,
कहाँ वो दरिया, बुझाती प्यास,
कहाँ वो सेबों के बाग़ ,
किसने ये लगाईं आग ,
यहां ठंडी झीलों की फ़ुहार ,
ना चचाजान के कंधे ,
ना इमरान की पुकार ,
छोड़ आये अपना मकान ,
दो कदम पैर थी ,
बाक़रख़ानी की दुकान ,
इमरान का हँसना ,
रानो , का रूठना ,
दोस्ती की हथेली में ,
रिश्तों का टूटना ,
माँ थपथापा कन्धों को ,
तोड़ती उसकी चेतना को ,
बास्ते थमा भेजती स्कूल ,
ना वो गली मोहल्ला ,
गुज़रते कभी, भूले से,
किसे आता है प्यार ,
झाड़ ,कटार ,सुखी मिट्टी के टीले से ,
साहिल ना जाने कहाँ हो तुम ,
कैम्प के किस कोने में हो तुम ,
अलग गाँव के यहाँ ,बसाया अपना जहाँ ,
सोचता बढ़ता नन्हा कदम ,
गिर पड़ा  ठेस से एकदम ,
सहलाते घुटनों की चोट ,
झाँकती माँ दरवाज़े की ओट ,
पानी लाने जाना नाले के पार  ,
यहाँ बिच्छु ,साँप हैं बेशुमार ,
यादें क्यों हर बार रुलातीं हैं ?
बर्फ़ीली हवा गालों को ,यहाँ
क्यों नहीं छू जाती है ?
बादल तो गुज़रते थे वहाँ भी ,
आँखों में बारिश  क्यों जाती है?
नन्हे मन की नन्ही बदलाव में ,
ना जाने क्या-क्या थे सहने।

()

राशन पानी देने का पैग़ाम ,
लघु कमरों में इंतज़ाम ,
उठाया हमने भी नारा ,
सरकार ने किया बेसहारा ,
बदलते समय में हम बदलते रहे ,
कालम उठा ,वार पे वार करते रहे ,
अपनी माँगो का पताका लहराते रहे ,
वोटों के ख़ातिर , नेतागण भी
हमारी नाज़ सहते रहे।
जनता इस बात को समझ रही
थी इलज़ाम का ताँता ऐसे चले ,
मानो हर मुक़दमें में
हम ही मुज़रिम बनते रहे।
कहावत ऐसी चल पड़ी ,
हर कुर्सी , हर दफ्तर के ,
हमसे ही है भरी पड़ी।
क्या सुनाये , बंजारा अपनी दास्ताँ ,
हमें भी जीने की कला सीखनी पड़ी ,
गिनती सीखने वालों को ,
रेत  भी गिनना गया ,
कुदरत के ख़ज़ाने  में जीने वालों को ,
अपना जेब तंग दिखाना आ।
संघर्ष ने सीखI हमेशा ,
तरक्की का साथ निभाना ,
मंज़िल ने सीखा हमेशा ,
बढ़ते क़दम से हाथ मिलाना।
झाड़ कटार में बीता बचपन ,
बदलते शख्सियत और नया स्वपन।
दंग लोगों को भी फिकरे कसना गया।
नज़रों के इस नाप-तौल में
ना जाने क्या-क्या थे सहने।

ज़हर का घूँट पी लिया ,
वक्त को बस में कर लिया ,
चढ़ गए हम सीढी - सीढ़ी ,
बीत गया पीढी-पीढी ,
अब ना कुछ था नया-नया ,
हर दरबार की हमपर थी दया ,
भूल गए अब सेबों के बाग़ ,
झूल रहे थे ,झूले सावन के ,
खुशबु वाले आमों के बाग़ ,
सबरी के बेर पर टूट पड़े हम ,
क्या जाने कश्मीर की गली ,
पतंग की उड़ान ,कंचों के चोट ,
नई पीढी को ना कोई ग़म ,
गर्व से थे हम फूले ,
कश्मीरी - डोगरी भाषाओं के झूले।
भूलती ज़िन्दगी के दौर में ,
ना जाने क्या- क्या थे सहने।
पंडितों की भाषा बानी डोगरी ,
किसने कहा , हम है सिर्फ़ कश्मीरी ,
उदा तूफ़ान में घोंसला तो क्या ,
बनाया घोंसला अपना ,
तिनके-तिनके से बया।
बसते सुख का घर फिर हराभरा ,
बंजारा कुछ रुक , कहा - रुको !
बंजारे सी ज़िन्दगी , फिर क्यों डरा?
फिर नयी सुबह आयी ,
चनाव की रैली छाई ,
सत्ता फिर हमपे कुर्बान ,
सुरक्षा दे हम पे मेहरबान ,
फिर वोटों की थैली आई ,
हमने भी कई माँगे थमाई ,
डर ही सही , नींव मज़बूत बनाई ,
फिर सत्ता हम पे छाई ,
फिर नोटों की थैली सब पे घुमाई ,
हम पे थे वे मेहरबान ,
हम पे थे वे कुर्बान ,
व्यापार की कला वक्त ने सिखाई ,
हमने भी मांगें अपनी उन्हें थमाई ,
डरकर जिया बहुत बार , पर
नींव अपनी मज़बूत बनाई
गयी नए पड़ाव की बारी
लेने आई , रथ की सवारी ,
बानी एक आधुनिक बस्ती
नाम था उसका जख्ती,
उखाड़ना , फिर बसाना ,
बसाकर फिर उड़ाना ,
ऐसे ही बंजारो को चलाना।
भूल चुके थे हम  , एक बात ,
हम थे बंजारों की ज़ात।
चाहे क्यों ना काटी हो
बीस सालों की ठहरी रात ,
याद रहेगा हमें ये डगर-शहर ,
पथरीली ज़मी का गर्म पहर,
वैसे गर्म हो रहे थे लोग यहाँ भी ,
क्या कहें किसका कसूर ?
पंडितों को करो नज़रों से दूर ,
सरकार ने हमारे नखरे उठाएं ,
 किसी को यह बात ना भाये।
डोगरे हुए थे नज़रअंदाज़ ,
हम भी उड़ रहे थे ,
बिन पंख, एक परवाज़ ,
इतने भी  हम बुरे नहीं ,
छोड़ जाए हम और ,
हमारा दिल तड़पे नहीं ,
दुखती राग हमें सताएगी ,
मेरी दस साल की बच्ची ,
क्या तुम्हे भूल पायेगी ,
इमरान,रानो और साहिल ,
की छवि , भीतर मेरे दिल ,
हालात बदल डालता है ,
व्यक्ति का व्यक्तित्व 
हम नहीं थे बोधिसत्व ,
फिर नए माहौल में ,
जाने क्या-क्या थे सहने।
     
बैठी वह अपने दहलीज़ में ,
देख रही आसमाँ दूर यों  ,
आसमाँ तो एक जैसे हैं ,
धरती में अंतर क्यों ?
फिर वही लौट आयी है ,
बिछड़ो की दर्द समायी है ,
राजनीति , नन्हों को क्या पता ?
मन में है जम्मू से जख्ती का रास्ता।
जम्मू के पथरीली भूमि ,
खेल का मज़ा थी दूगनी ,
पतंग और रंगीले कंचे ,
सुमित मधु , अमित हम सब बच्चे।
जम्मू का गलियारा
था बहुत प्यारा ,
गर्मी की लस्सी , सावन की रस्सी ,
सोच , बादल आँखों में घिर आये ,
बंजारों का सफर है ,यह बात ,
नन्हों को कौन समझाए ,
टूटे देश को सबने देखा ,
छोड़ो मासूमों का क्या ?
फिर से बसने की कोशिश में ,
ना जाने क्या- क्या थे सहने।

()

मुस्काती धीमे चाल से ,
कई बार राजनीति आई ,
खींचा रेखा तेज़ धार से ,
भारत की ह्रदय रुलाई ,
आज़ादी के नशे में ,
बॉटने की प्रथा चल आई।
दाल दरार दर्पण पर ,
वजूद मिटाने खेल निभाई ,
कभी ईद थी बेज़ुबान ,
कभी दिवाली सुनसान ,
भारत की छाती पर ,
बनते राज्यों का गुमान ,
खींच-खींच लकीरें , बदलते तकदीरें ,
किया देश को शर्मसार ,
सब दुर्योधन ,नहीं कृष्ण जन्मा।
धरती खड़ी सर झुकाये ,लाचार।
आज नेताओं ने क्यों बाँट रहे ,
कुंती के वस्त्र ज़ार-ज़ार।
परम्परा बदलने के खेल में ,
ना जाने क्या-क्या थे सहने।

भारत भूमि हुई हैरान ,
तानते बंदूकें हर किसान ,
आतंकियों सा दांव काया ,
बाँट देश को करते गुमान ,
कभी दंगों का शोर , कभी छाया शैतान ,
ये हैं कलयुग के भगवान्।
चीरा अपने ह्रदय तो पाया रावण ,
ऐसे है हनुमान। .
अब नहीं राम , ना ही वनवास ,
अब नहीं होती जीत यहां
 पांडवों की अज्ञातवास।
कश्मीर का दर्द कुछ काम ना था ,
मुखयते में नेता का ह्रदय
क्या कहें नरम ना था ,
सुलगा रहे थे चिंगारी ,
इनका कोई धर्म ना था।
किसने बंटवारे की कहानी
हिदुस्तान-पकिस्तान की ,
कश्मीर में लेकर आई ,
दोहराती कहानी किसे बनी ,
जैसे कबाली,अफ़ग़ानी थे शकुनि ,
जम्मू में थे हम पराया ,
क्यों ना हो ,अपनों ने जब अपनाया।
सुलगती सेज़ ,धर्म पर जली ,
तभी से ख़ूनी होलिका जली।
हम ना थे इधर के ना उधर के ,
जिंदगी कतई थी बंजारो के ,
पहियों और राह पे।
वोटों के इस आग में ,
ना जाने क्या-क्या थे सहने।

बस रही थी जख्ती नोकरी पेश मिली सस्ती ,
सत्ता में अब चमक  ,कूटनीति में दमक थी,
सरकारी बुलावा , पंडितों को कश्मीर बुलाया ,
हम बने थे शिक्षा के दूत , नोजवान और सपूत ,
दौड़ पड़े कश्मीरी जवान , रोटी कपडा और मकान ,
नीति की आड़ में थे सरकार हमारे दातावान ,
हर चाल से अनजान, मशाल लें चले जवान ,
भूल पाए थे उस दहशत को
निकाला या छोड़ा  अपने चमन को ,
आतंक की रात में तुमने ,
क्रान्ति लाई या उजाड़ा वतन को ,
उजड़े वतन को तालिम देने में ,
जाने क्या-क्या थे सहने।

अब सुरक्षा हम पे छाए , हम मेहमान
अपने घर ही , बन आये।
ग़र थे हम , अपनों से भागे ,
तांडव थे किन्होंने मचाये।
कौन लगाया नफरत के बीज,
किसने बढ़ाया इसे सींच ,
कौन था वो चैन से सोया ,
अपनों में लकीरें खींच ,
किसने हमें भगाने की कसमें खाई ,
कैसी ये साजिश रचाई ,
किसने नफरत की आग में ,
अपनी रोटी थी पकाई ,
कहता ये बंजारा ,
आतंक, नेता हो या धर्म ,
सब हैं आपस में भाई -भाई।
जिन्होंने सदियों की खाई बनाई।
नफ़रत के इस खेल में ,
जाने क्या-क्या थे सहने।

तुम थे अनजान , हम भी थे अनजान ,
हमारे बागों की रक्षा कर ,
दिया भाई का प्रमाण ,
आज भी तुम अपने घर बुलाते हो ,
कांगड़ी हमारे जलाते हो,
मिलने की ख्वाहिश जताते हो ,
क्या कहे ये बंजारा ,
फिरता है आवारा-आवारा ,
मुकद्दर क्या था अपना ,
दर-दर भटकना।
सरकार ने बसाया कई बार ,
बसना है हमें बार-बार ,
पर ना लौट आना , कश्मीर ,
मुल्क अपना एक बार ,
हुकूमत का यही है मन्त्र ,
प्रजातन्त्र में राजतन्त्र ,
अज्ञानता ने ऐसा डांक लगाया ,
दो गज़ ज़मी पर ,
क्यों ? शिक्षा का अन्धकार छाया ,
क्यों?सरकार ने हमें बुलाया।
शिक्षित करने के युग में ,
ना जाने क्या-क्या थे सहने।

()

वहीं खड़ा , आज भी पर्वत , दरख़्त ,
आने के इंतज़ार में अबतक ,
लोग क्यों हुए थे इतना सख़्त ,
वही टूटा-जला  मकान देख ,
ना रो सका अपने गिरते अश्क ,
क्यों रो रहा ये दिल कम्बख़्त।
कह रहा ये बाग़, क़ेसर-क्यारी ,
ना देखा हमारा बढ़ता बचपन ,
कर रही हैं, आज भी शिकवा ,
सूना आँगन , बिखरी अटारी ,
एक टूक सा वो देखता ,
छिपाता अपने अश्क, भारी ,
आसमाँ तो एक जैसे हैं ,
फिर पराई क्यों ज़मी सारी।
छुपाते इन उद्वेगों को ,
ना जाने क्या-क्या थे सहने।

तभी सरसराती , सूनेपन की आहट ,
दादी की खट-खट ,
हुक्के की गुड़गुड़ाहट ,
बिन उसके सूना था चौखट ,
दहलीज़ पर जैसे ही रखा क़दम ,
दादी फुसफुसाई कही से एकदम ,
लौट आये तुम ,
अँधेरी कोठरी से क्यों आती ?
यादों के बारात झूमकर ,
दादी उठा लेती थी चूमकर ,
फिर उनकी थपकी , मेरी झपकी ,
फ़िरन का कोना छुड़ाती ,
हाथों से मेरे , उलटे घूमकर ,
दीवार से टिक खड़ा वो ,देखता इमरान को
 आता करीब वो , ख़्वाबों में पड़ा वो ,
ज़ोरों का हँसना , चौखट से झांकना ,
 सदियाँ बीत गईं , यहाँ कूदना-फाँदना,
देखता आसमान की ओर ,
आसमाँ तो एक जैसे हैं ,
क्यों बटी ज़मी की छोर ?
कुसमुसाते इस बचपन को,
ना जाने क्या-क्या थे सहने।

गाँव के स्कूल, हलवाई की दुकान,
उछल-उछल , कदमों को गिन-गिन ,
बर्फ़ीले रस्ते से , पढ़ने जाना हरदिन ,
चचाजान की गोद , मूछों तले रोब ,
हँसकर चिलगोज़े पकड़ाना ,
उनकी दाढ़ी सहलाना ,
लापरवाह,बेपरवाह सी ज़िन्दगी ,
लुढ़कती नर्म मखमली घास पर ,
खूबसूरत सी ज़िन्दगी ,
पढ़कर लौट आना ,
शीर चाय , कुलचे खाना ,
खोने के इस दर्द में ,
ना जाने क्या-क्या थे सहने।

आज तुम्हारे बने मेहमान ,
आज भी ढूँढती है अपनी नज़रें ,
कहाँ है पिन्नो ,अजाज़ , इमरान ,
क्यों नहीं आये तुम चौखट पर ,
बन मेरा मेज़बान।
अब भी एक कशिश है कहीं ,
खींच हाथों को पकड़ ,
मुझे क्यों रोका नहीं ?
साथ रहने वाला इमरान हरदम ,
बिदाई का रस्म निभाता ,
हवा में हाथ हिलाता ,
कुछ दूर तलक चला ,वो नन्हा कदम,
खींच लिया था, चचाजान  
कह रही थी खामोशी ,
ना बढ़ाना अब से पहचान ,
दूर तलक हमारी नज़रें ,
साथ हो लिये थे , वो आखिर पल,
इमरान के चाह में ,
ना जाने क्या-क्या थे सहने।

   
()


फिर , कश्मीर - भ्रमण ,
बिन माता-पिता के , चला श्रवण ,
जख्ती था परिवार ,
कश्मीर था रोज़गार ,
सरकारी दोहरी मंशा ,
जानती थी , अब साड़ी जनता ,
कर शिक्षा का प्रचार ,
लौट जान जख्ती , अपने घर-बार ,
दें, नॉकरी-पेशा , घर-द्वार ,
पर ना बसना , कश्मीर में एक-बार।
हरदिन का बना समाचार ,
सनसनी लोगों में चली ,क्यों दिया?
 नॉकरी सस्ती, बस्ती जख्ती,
पूरी की ख़्वाहिश बेशुमार ,
चाहें जले थे मकान तार-तार।
आज चल रही है सुरक्षा , साथ ,
अंगारे भी बढ़ा रहे मिलाने हाथ ,
क्यों हम पर , ये एहसान ,
पूछ रहे , ये काले-जले मकान।
किन बेड़ियों में थी सरकार बंधी ,
किन मजबूरियों में थी तब खड़ी ,
उसी शहर में हमें बनाया मेहमान ,
जहाँ था कभी अपना मकान ,
कह बंजारा सिसक पड़ा ,
सरकार तुझसे अब भी है गिला ,
आज हमें क्यों ? सुरक्षा मिला।
देख हुए हम हैरान , तेरी लीला,
मत भूलो हमने सज़्ज़ा काट ली है ,
पर ज़ख्म अब भी ना सिला ,
हमारी माँ तो बिफरी थी ,
तुम भी हुए बरबाद
हमने वनवास काटी थी
तुम भी ना हुए आज़ाद ,
हमने अपनों की लाशें उठाई थी ,
तुम्हारे मुर्दे भी हुए आबाद ,
हमें परदेस चुभते थे ,
तुम यहाँ मरहम ढूंढते थे।
तुम्हारी पीढ़ी भी जली ,
हमारी पीढ़ी भी सम्भली ,
पूछती हैं ये वादियाँ ,
खुनी झीलों में , कमल क्यों ना खिली ?
प्रश्नों से भरे इस थैले को ,
ना जाने क्या-क्या थे सहने।
कैसी विपदा आयी ,
बर्फीली सेज़ पे आग लगाई ,
फिर तख्त पलटा , लगा झटका ,
जीत गयी सरकार मोदी की ,
अब ना  था कोई  पर्दा ,
वादा किया कश्मीर बसाने की ,
यह सबके गले अटका ,
पंडित ज़रूर वापिस आएंगे ,
पर अलग कॉलोनी नहीं बसायेंगे।
जहाँ से उखाड़े थे पौधे ,
वहीँ जाकर लगाएंगे।
कहना था ये बड़ा आसान ,
पूछ रहे आज भी जले मकान ,
क्यों शिक्षको की रैली बुलाई ,
क्यों शिक्षकों की बस्ती सजाई ,
क्यों सुरक्षा इनकी शान बनी ,
क्यों ? सरकार थी मेहरबान बनी ,
सवालों की इस उलझन में ,
ना जाने क्या-क्या थे सहने।

माना की हमारे पूर्वज थे कमबख्त ,
कराते बेगारी तुमसे, कटाते दरख्त ,
बन्दूक नहीं था इसका हल ,
कमज़ोर किये तुमने कलम का बल ,
शिक्षा देने आये हम ,
क्योंकि तुम हुए थे दुर्बल ,
झगड़ों ने कई इतिहास रचाई ,
तरक्की कभी ना हो पाई ,
देख बंजारा हुआ दुखी ,
स्वर्ग में हाथापाई ,
अज्ञान की अन्धकार छाई ,
कई पीढ़ियों को बिगाड़ी ,
बदलते व्यक्तिव बनाई ,
इस तरह बदलते है हम
बदलता है समाज हमारा।
आज के बच्चे क्या जाने कश्मीर ,
क्या जाने साधू,सन्त या पीर,
जम्मू बिन लगे उन्हें बेसहारा ,
जहां खुदा  का आवासथा,
देवों का वास ,
पहिये का रुखमोड़ लो ,
अपनी लड़ाई ,   जीत लो ,
लेकर ,फिर से नया जनम ,
मेल हो या मिलाप हो
बढ़ा लो नया क़दम
बंजारा वापिस रहा ,

अपनी दास्तान सुना रहा।