Wednesday, 21 June 2017

कतरे पंखों को





         कतरे पंखों को, हर सफे में संजो   
         


             ,



कह गए , तुम्हे उड़ना ही ना आया।  

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खड़े हुए क्या हम अपनी ही जगह,
मुज़रिम सा तवज्जो आपने फ़रमाया।

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मजलिश में अफ़सोस के कतरे आँसू ,
दिखावे में कई फर्क नज़र आया। 





छालों से क्या सवाल ?  बयाँ सफ़र  का,
पत्थरों ने अबतलक जूझना ही  सिखाया।
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सन्नाटे का शोर, आ कर लौट जाती है ,
वफ़ा कहीं अकेले में होगा , कहराया।

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किसने कहा,ख़ुदा न की फर्क किसी में ,
फ़िर ज़मी आसमां में क्यों फर्क नज़र आया।
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जब भी नज़रें उठीं , तोहमत के दावेदार पर ,
दीवारे  रिश्तों का बुनियाद ही हिलता पाया।
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 ना झाँका  कभी, मेरे  वीराने  आँगन में
सरेआम ,जनाज़े से पहचान बढ़ाया।  

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 लौ का इठलाना तो देखो,अपनी रौशनी पर
 फतिंगों के पर जलाये होंगे, पर किसी को क्या।
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रोती हैं  जब  भी मासूम  की आँखे ,टूटते   इश्क पे 
दर्दे अलफ़ाज़ में ऐ !ग़ालिब, ज़फर, तू ही तू   नज़र  आया 

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---'लीना '

Wednesday, 14 June 2017

अकेला

वह पड़ोसी था हमारा। हमारे मकान के विपरीत सड़क पार उसका मकान था। दूसरी मंज़िल के छत के कोने में एक छोटा सा कमरा औऱ एक बाथरूम का सेट उसके छोटे भाई ने उसे दे रखी थी। अकेला कमरे में कभी सिगरेट सुलगाता कभी खांसता दिखाई देता था। हम भी दूसरी मंज़िल में रहते थे। जब भी मैं बालकनी में झाड-बुहार करने निकलती, मेरी नज़र ख़ुद-ब-ख़ुद उस ऒर चली जाती। अक्सर वह अकेला ही खुद से बातें भी किया करता था। धीरे-धीरे वक़्त बीतने के साथ-साथ उस अकेला व्यक्ति से परिचित होने लगी।उनकी उम्र यही कोई साठ-पैंसठ की होगी। आँखे सामान्य से कुछ अधिक लाल। पहली मंज़िल में छोटे भाई अपने दो बेटों के साथ रहते थे। पेशे से इंजीनिर थे।दूसरी मंजिल में अपने बड़े भाई के लिए एक छोटा सा कमरा और एक बाथरूम बना कर दिया था। उसी कमरे में उसकी बच्ची ज़िन्दगी  बड़े सुख से बीत रही थी। छोटे भाई का तबादला पहले कश्मीर में हुआ फिर दो सालों के बाद पुंछ नामक एक गाँव मेहो गया। उनके दोनो बेटे दिल्ली में इंजीनियरिंग की पढाई कर रहे थे। जम्मू के इस शहर में वह अकेला छत पर
टहलते । न जीवन मे कोई लक्ष्य ओर न ही कोई उम्मीद।
एक दिन मैं अपने बेटों के साथ बाज़ार से लौट रही थी । अपनी गली की ऒर जैसे ही मुड़ी वो सज्जन जिनकोमे अकेला कहकर संबोधित किया करती थीं, सामने से धीमी चाल में चले आ रहे थे। एक ही पल में हम एक दूसरे सामने थे। हर रोज़ बालकनी से दिख ही जाते थे। इस कारण मेरे लिए वो आपरी हिट ना थे।उम्र का लिहाज़ करते हुए मैंने नमस्ते कह दिया। साथ ही मेरे बेटों ने भी नमस्ते कह कर उन के लिए सम्मान दिखाई। हमारा यह व्यवहार देख , उनके चेहरे में एक खुशी की लहर दौड़ गई।उन्होंने हमारे अभिवादन का उत्तर बड़े अदब से प्रसन्न हो कर दिया। अब जब भी आते जाते भेंट होती नमस्ते कह कर आगे बढ़ जाए करते।
वक्त बीतता गया। दो साल बीत गए। एक दिन अकेला के बारे किसी पड़ोसन ने कहा कि वो बहुत शराब पीता है।मैने उसके परिवार के बारे जानना चाहा, पड़ोसन भी नही जानती थी। फिर मैंने पूछा , खाना क्या वह खुद बनाता है? पड़ोसन-- "हाँ खुद ही बनता है। कभी कभी थापा के परिवार अपने बच्चों के हाथों खाना भेज दिया करते है।"
"सारा दिन बेचारा आसमान देख- देख कर ही दिन काटता है।सुना है , ये इंजीनियर थे, एक बेटा भी है इनका जो गांधी नगर में रहता है।" पड़ोसन ने जो कुछ भी जानती थी मुझे बता कर , मेरा बोझ बढ़ दिया। कई प्रश्न मुझे सताने लगी। यदि एक पुत्र है तो वो कभी मिलने क्यो नही आता। खुद ही जवाब देती हूं। शायद बाप बेटे में बनती ना होगी। क्या जाने छोटे भाई ने मकान की रखवाली के लिए इन्हें रखा होगा। मगर यह जान कर की वो बहुत पीने वाला है मै उस दिन से कतराने लगी। अकेला रहता है। क्या जाने एक स्त्री का नमस्ते करना , उसके लिए क्या मायने रखता हो।कभी मेरे बच्चों को देख कर मुस्कुराया करता था, कभी हाल चाल पूछ लिया करता था। सिर झुका कर आते-जाते दिखा करता। अब तो वह जब भी मुझे बालकनी में देखता, हाथ मे लिए सिगरेट को छुपाने की कोशिश करता। अकेला को मैं एक शराबी की  मापदंड में तौलती हुई , नज़रों के कोने से देखती हुई नज़रअंदाज़ करती।इस प्रकार एक और साल बीत गए।

तीसरे साल में छोटे भाई का परिवार वापस अपने घर लौट गया। छोटे भाई रिटायर हो चुके थे। अकेला आदमी को अब परिवार मिल गया। घर मे उनकी रौनक बानी रहती थी। अकेला भी खुश नजर आने लगा। दीवाली वो अपने दोनों भतीजों के साथ खूब धूम धाम से मनाई। उनकी भी इंजिनीरिंग की पढ़ाई पूरी कर ली थी।

उनके घर वापिस आने के तीन महीनों के बाद अचानक उस कमरे ताला लटका दिखाई देने लगा। आसपास खबर फैलने लगी कि गोस्वामी परिवार के बड़े भाई को ओल्ड एज होम में दाखिल कर दिया। यह सुनकर थोड़ी सी दुख की अनुभूति हुई। कारण ये पता लगा कि बहुत शराब पीते थे। मेरे मन में एक शंका का जन्म हुआ कि जब अकेले थे तब मैंने शराब में धुत्त हो कर लड़खड़ाते आ रहे हो या जा रहे हों , नही देखा। एक अदब ओर संकोच ही पाया। और आज जब सारा परिवार एक साथ है तो अधिक पीने की वजह से ओल्ड ऐज होम में भर्ती कराना पड़ा। फिर स्वयं को नियंत्रित करते हुए उस ऒर अधिक ध्यान न दिया।
अभी दो महीने ही बीते थे कि एक शाम उनके घर बड़ी बड़ी आठ दस गाड़ियाँ खड़ी थीं। मैं अपने बेटों के साथ अपने पालतू कुत्तों को घूम कर लौट समय देखा कि उनके गेट के सामने इतनी गाड़िया खड़ी है। पड़ोस के किसी व्यक्ति ने बताया कि उनके घर में किसी का देहांत हो गया है। मैं घर लौट आई और समय देखा तो आठ बजे थे।मैन सोच सुबह अफ़सोस करने चल जाऊँगी ।सुबह के नौं बजे थे।मैन सबको नाश्ता देकर उनके घर गई। पड़ोस के औरभी लोग आए। साढ़े दस बजे लाश उनके घर मे आई। लाश का चेहरा सफेद कपड़े से पूरी तरह ढँका था। किसकी मृत्यु हुई है। मुझे अब तक नही पता था। अपनी उत्सुकता को समाप्त करते हुए किसी संभ्रांत महिला जो उन गोस्वामी परिवार के सद्स्यों में से एक थी, पूछा,""किसकी मृत्यु हुई है।" महिला ने जो बताया सुनकर अकेला शब्द का पूरा अर्थः समझ आया। महिला--" ये मेरे बड़े भाई हैं। इनसे एक ग़लती क्या हुई , सज़ा उम्र भर का था।"कह कर फुट -फुट कर रोने लगी। कुछ रुक कर, कहने लगी। मेरा  भाई बड़ा शरीफ था। न जाने किन लोगों ने इसे शराब की आदत डाल दी। इसके तीन बेटियाँ ओर दो बेटे थे। बीवी इससे बड़ा तंग आ गई थी। अरे, हम थे, हमारे पास आती।  हम कुछ सोचते। मुई, एक दिन कुछ का बैठी ओर मर गई। मा के जाते ही चार दिन तक एक फिर एक चारों बच्चों की लाश घर से निकली। सबसे छोटा बच गया इस लिए की वो नानी घ्रर में था। भाई मेरा पांच साल तक जेलमे रहा। उसे बाहर निकालने के लिए मैं कहाँ-कहाँ नही दौड़ी। इसकी नॉकरी भी चली गई। " फफक कर रोती रही। अपने छोटे भाई को भी कोस रही थी कि क्यो ओल्ड ऐज होम भेजा।" मै तो बड़ी मजबूर थी इसे अपने पास नही रख सकती थी, क्योंकि ससुरालवाले ने रखने से मना कर दिया। उनकी बदनामी होती थी जो, हाय मेरा भाई।"" ज़ोरो की दहाड़ मारकर रोती हुई बेहोश हो गई। सभी उसके पास आ गए।कोई पानी छिड़कने लगा। थोड़ी देर पश्चात बेटा बहु के साथ आया। आया नही उसे लाया गया। मुँह में अग्नि कौन देगा? इस प्रश्न की चर्चा भी चल रही थी।एक बजे पूरी तैयारी के साथ  जनाज़ा जाने लगा। रोने वालों में सिर्फ बहन थी। ओर कोई भी ना था। सब जल्द से जल्द काम निपटाने के लिए आतुर थे। दोनो भांजे मासूमियत के साथ खामोशी थामे ताया को जाते देख रहे थे। क्योंकि शमशान घाट ना जाने का आदेश पिता ने दिया था।

एक महीना के बाद
एक शाम , सात बज रहे होंगे। दरवाज़े पेर दस्तक हुई। मैं बाहर निकली। अकेला का छोटा भाई अपने बडा बेटा की शादी का कार्ड हाथ मे लिए खड़े थे।शादी खूब धुन धाम से हुई। बहु अमेरिका की पंजाबी परिवार की थी। बहु के पिता का कारोबार अमेरिका तथा अन्य देशों मे फैला हुआ है। समाज के इज़्ज़तदार परिवार से संबंध हुआ।
मेरे मन के अंदर से एक ही आवाज़ आई," चलो अच्छा हुआ। आकेला की मृत्यु हो गई अन्यथा ताया की बदनामी इन बच्चों के जीवन मे भी असर डालती।