Friday, 17 February 2017

खुदगर्ज़ ,

                                                                             

    मेरे हर सलामी पे , खुदा ना बन ऐ खुदगर्ज़ ,
मुझ में भी ख़ुदी है ये  खुदगर्ज़ी ,
दे जाता हूँ , ज़िंदा होने का सबूत ,
बस छोटे से सलाम में।

भूल जाता हूँ ,  हर भूल को ,
ढूंढता हूँ  खुद की इमारत ,
भूले - बिसरे आया हूँ यहाँ ,
आइना खुद का, याद दिलाने को।

हमारा दर्द भी कुछ काम ना था 
हम हुए हल्के तेरे हलक के आगे ,  
जब था दर्दे हिस्सेदार का हिस्सा 
हमसे ज़रा था  ,भारी। 


Wednesday, 15 February 2017

"story" by jeni john

कहानी





हमारे जीवन की वास्तविकता  ही कहानी को जन्म देती है।
छह बेटियों एवं दो बेटों का नेपाली परिवार किसी खाली ज़मीन पर झोपडी बना कर रहते थे। आज के मशीनी पहचान वाले संसार में ,उनके आठ बच्चों ने पूरे मोहल्ले के वातावरण को प्रकृति से जोड़ रखा था। कभी टायरों के पीछे , कभी खाली डब्बे को रस्सी से खींचते  नज़र आते और उस डब्बे के भीतर बैठने की आपस में होड़ लगी होती। उनमें सबसे बड़ी बेटी थी।उसकी  शरीर की हड्डियाँ बाहर आकर ग़रीबी की दशा वर्णन कर रही थी। बारह वर्ष की वह ऐसी दिखती थी मनो दस  वर्ष की उम्र की हो।  वह अक्सर अपने सबसे छोटे भाई को गोद में उठा कर  दिन भर घूमती रहती थी। माता-पिता  दिन भर घर पर ना होते थे।  छोटा सा झोपड़ी दिन भर खाली ही रहता था। माँ लोगों के घरों में बर्तन मांज कर गुज़र-बसर कर रही थी। बच्चों के तन में मैले-कुचैले , फाटे-पुराने वस्त्र टंगे होते थे। पिता को इनकी कोई फ़िक्र नहीं होती थी। हर दिन वह सुबह काम पर निकलता और देर रात को नशे में धुत डोलता-डालता , गिरता-पड़ता घर लौटता था। माँ जब भी काम से लौटती , साथ में घरो के बचे-कुचे जूठन को अपने साथ बाँध कर ले आती थी।      
         तीन वर्ष पहले पिता दो साल की सज़ा काट कर आये थे। अपने भाई को चाकू मार कर हत्या करने की ज़ुल्म में उसे सज़ा हो गई थी। उस रात अचानक चीखने चिल्लाने की आवाज़ ने आसपास के रहने वालों को चौका दिया। उस नेपाली के घर के नज़दीक जाकर जमा हो गए। सबके अंदर उत्सुकता यह थी कि इतनी रात को आखिर क्या बात हो गई ? झोपड़ी के भीतर एक मद्धिम सा बल्ब जल रहा था। सब अपनी अपनी सीमा में रह कर झोपड़ी के अंदर हुई घटनाओं  जानना  थे।
फिर लोगो ने पिता को बाहर जाते देखा और फिर शान्ति छा गई। लोग भी अपने घरों को लौट गए। काफ़ी रात हो चुकी थी। दूसरे दिन काम पर जाने की चिंता कर , सब वापस चले गए।  तीन बजे होंगे , अचानक किसी मर्द के चिल्लाने स्वर गूंज उठा और फिर शान्ति छा गई। लोग घबराकर नेपाली की झोपड़ी की ओर ही  दौड़े। पर झोपड़ी की बत्ती बंद थी। लेकिन कुछ लोगों ने उस अँधेरी रात में किसी व्यक्ति को  उस नेपाली के भाई के झोपड़ी से बाहर भागते हुए देखा और अँधेरे में गम हो गया। चारो ओर शान्ति ही शान्ति थी। लोग आपस में बुड़बुड़ाते घरों को लौट गए। सुबह नेपाली के घर से रोने-पीटने की आवाज़ आने लगी। पुलिस भी गई। लोग फिर जमा हो गए। पूछताछ हो रही थी। नेपाली की पत्नी पुलिस को बयान दे रही थी कि रात को कुछ लोग आये थे जिन्हें वे नहीं जानते थे और भाई को मार कर भाग गए। बच्चे सहमें से घर के आसपास घूम रहे थे। पति बीड़ी फूंकता और ज़ोरों से  खांस-खांस कर स्वयं को दयनीय अवस्था में दिखा रहा था। माँ कभी छोटे बेटे को मारती तो कभी बड़ी पर झुँझलाती। तभी दूसरे नंबर वाली बेटी , गोल एवं गोरा  चेहरा , छोटी नाक , भूरे रंग के केश जिसमें लाल रंग के फीते लगे हुए पुलिस के सामने आई और एक ही स्वर में कहा अंकल बाबू (पिता ) ने चाचा को मारा है। माँ स्तब्ध देखती रही और पिता भी उठकर खड़ा हो गया। पुलिस ने उसे गर्दन से पकड़ा और खींचती हुई गाड़ी में बिठाया। माँ कई नेताओं के घरों में भी  काम करती थी। उनके सम्मुख अपनी लाचारी का और आठ बच्चों को पालने की समस्या रोती और पति को जेल से छुड़ाने की मदद माँगती रहती थी। दो वर्षों के बाद वह घर लौट आया।


तीन वर्ष बीत चुके  थे। पिता का शराब पीना बढ़ता ही  रहा था। माँ घरों में काम कर बच्चों  पालती। घरों से कभी-कभी पुराने बच्चों के कपडे  जाया करते थे। कपड़ों को देख बच्चे ख़ुश हो जाते थे। मानो उनके लिए त्योहार हो। बस वे देखते कि किस की नाप का वस्त्र है। जिसे भी  जाता वो पहन इतराता। शाम को जब घर में  माँ जूठन लेकर लौटती तो  बच्चे माँ को घेरकर बैठ जाते। माँ एक एक कर सबको खाना खिलाती। ताकि सभी  बराबर से पेट भर  जाए। इन बच्चों कीदुनिया बहुत बड़ी थी। कभी टायर लेकर सड़क पर लुढ़कते दौड़ते।  कभी भैसों  की पूँछ पकड़ खींचते और जब भैंस अपनी पूँछ झटकती तो खिलखिला कर हँस पड़ते। तितलियों के पीछे  भागते हुए झाड़ियों  विलीन हो जाते थे। सारा संसार उनका ही  तो  था। किसी  से न द्वेष और ना ही किसी से बैर। शादियों  ये बिन-बुलाये मेहमान अवश्य पहुँचते। अरे! जूठन खाने नहीं , बल्कि आइस-क्रीम की मेज़ पर धावा बोलने। लोग भी उन्हें स्वीकार कर चुके थे। उन्हें आइस-क्रीम देकर ,साथ  कुछ खाना देकर पुण्य कमा लेते थे। 
मेहँदी रात को भी इनका पहुँचना अवश्य था। मेहँदी लगाती महिला के सम्मुख अपना छोटे-छोटे  हाथ फैला देते। 
कभी तो लोग उनपर तरस खाकर मेहँदी लगा दी जाती कभो डाँटकर उन्हें भगा दिया जाता। बरसात में ठहरे पानी के छप-छप कर एक- दूसरे को भिगाना। इस स्वच्छंद संसार में कुछ भी पराया  था। 
उस दिन की बात है ये बच्चे कुत्ती के बच्चों  लिए घास-फूस से घर बना रहे थे। चार-पांच दिन ही हुए थे एक काली रंग की कुत्ती ने छह पिल्लों को जन्म दिया था। बड़ी भी गोद में छोटे को लिए वहीँ खड़ी थी। शाम के छह बज रहे  होंगे। मोहल्ले के सभी बच्चे घर से बाहर थे। कोई साइकिल पर सैर कर रहा था , तो  कोई क्रिकेट खेल रहा था।     पर ये नेपाली बच्चे पिल्लों  के लिए घर तैयार कर रहे थे। तभी अचानक एक मारुती कार आकर उन बच्चों के समीप रुकी एवम दूसरे नंबर की बेटी को अंदर खींचा। वह चीखती ही रह गई। कार तेज़ी से चली गई। बड़ी भाई को गोद  कुछ दूर तक   दौड़ती कार  पीछा भी किया , पर कुछ भी हाथ ना आया।  मूकबद्ध देखती ही रह गई। 
                        शाम को सभी भी-बहन घर जल्द ही लौट आये। झोपड़ी में सन्नाटा था। माँ के घर में प्रवेश करते ही सभी ने एक साँस में सारी घटना सुना डाला। माँ उनके साथ उस जगह गई जहाँ से मँझली को गाड़ीवालों ने कार में खींच लिया था। कौन थे , कैसे दिखते थे ? कई सवाल कर अपने बच्चों से जानकारी  लेनी चाही , पर कुछ भी पता ना लगा पायी। जब कोई हल ना निकाल पाने पर बच्चों पर झुंझलाने लगी। उसके आँचल में एक ममता का गला घोंटा जा चुका था। दूसरी बात का भय यह था कि पति को क्या जवाब देगी। आज ना जाने पति क्या करेगा ? शायद बच्चों को मारे या फिर उसे ही मारे। मारे बेचैन वह पति  लौटने  इंतज़ार करने लगी। थोड़ा रुक-रुक कर ज़ोरो की ग़ुहार लगाती। आँसू पोंछती। रात के ग्यारह बज चुके थे, अब वह चाहती थी की पति ने जैसा चाहे व्यवहार करना है करे। जो  होना है हो जाए। साढ़े ग्यारह बजे , पति का घर में आगमन हुआ। बच्चे सो चुके थे। पति नशे में धुत , डोलता-डालता अपने बिछावन  लेट गया  जो झोपडी  के कोने में बिछा हुआ था। 
पत्नी  फुफुसाते हुए सारी घटना  पति को सुना डाली। यह घटना सुनते ही एक ओर मुँह करके ज़ोर  बोला," अच्छा हुआ " ?
अगले दिन सुबह ,मोहल्ले के प्रेसीडट साहब ने पुलिस स्टेशन जाने का आग्रह किया। लेकिन वह बीड़ी को दिवार"पर रगड़ता , खिड़की  बाहर देखता हुआ बोला ," सभी यहाँ  जाए , मैंने पुलिस में रपट नहीं करवाना है। "

यह सुनते ही सभी सज्जन अवाक रह गए। 
नेपाली का यह इनकार , सभों के माथे में प्रश्न चिन्ह ले आया।  बात मोहल्ले के घर-घर तक पहुँच गई। फिर जितनी मुख उतनी कहानियाँ बनी। 

बड़ी का स्वछन्द संसार सिमट कर झोपड़ी के भीतर तक रह गया। उसके कानों में बहन का अंतिम स्वर अबतक गूँज रहा था ,दीदी    .. .. .. .. . I 














                                                                                                                         







              

आदमी jeni john's poem

आदमी

किस्से   छिड़   चुके  हैं,   दरम्यान,  आदमी   की     ज़ात ,
ढूंढ़ता     हर    शख्स ,    आदमी      की     ही    ज़मात I



कहकहों   का   गुलज़ार   कहीं,   कहकहों के  बाज़ार   में ,
ढूढ़ता     सुकून,  जहाँ    कहकहों    के     ख़ाक     बिछी I

तकल्लुफ   में    ही   ऐब   थी, या  शख्स   को  इल्म  नहीं ,
ढूंढ़ता    हमदर्द    अपना,   जहाँ   मातम   के   रात   मिली I

होशियारी, तंज़  था, और  था फरेब , हर दोस्तों    के   शहर ,
हमने भी काट ली हर रात, जहाँ  थी  दुश्मनों की गुज़र-बसर।

Tuesday, 14 February 2017

jeni john's poem नहीं लिख रहा

नहीं लिख रहा

नहीं लिख रहा मैं ,
कई अर्सों से , सुन रहा हूँ।
दामिनी की आग पर ,
भीगे अश्कों का गिरकर ,
रोने का स्वर, नहीं सुन रहा ,
ठंडी होती राख का ,
कुसमुसाना , सुन रहा हूँ।

नहीं लिख रहा मैं ,
कई अर्सों से , सुन रहा हूँ।
घुटते स्वांसों का राज़ ,
श्वेत क़दमों की आहट , नहीं सुन रहा ,
लहलहाते लाल फसलों की ,
सरसराहट , सुन रहा हूँ।

नहीं लिख रहा मैं ,
कई अर्सों से , सुन रहा हूँ।
खाली पेट का ,
खाली ही बजना , नहीं सुन रहा।
पानी के  घूँट का
गुडकनासुन रहा हूँ।

नहीं लिख रहा मैं ,
कई अर्सों से सुन रहा हूँ।
देश की सीमा पर ,
सर कटने  की चीख, नहीं सुन रहा।
दरवाज़े की ओट से
सुबकने का स्वर , सुन रहा हूँ।