कतरे पंखों को, हर सफे में संजो
,

खड़े हुए क्या हम अपनी ही जगह,
मुज़रिम सा तवज्जो आपने फ़रमाया।

मजलिश में अफ़सोस के कतरे आँसू ,
दिखावे में कई फर्क नज़र आया।
छालों से क्या सवाल ? बयाँ सफ़र का,
पत्थरों ने अबतलक जूझना ही सिखाया।

सन्नाटे का शोर, आ कर लौट जाती है ,
वफ़ा कहीं अकेले में होगा , कहराया।

किसने कहा,ख़ुदा न की फर्क किसी में ,
फ़िर ज़मी आसमां में क्यों फर्क नज़र आया।

जब भी नज़रें उठीं , तोहमत के दावेदार पर ,
दीवारे रिश्तों का बुनियाद ही हिलता पाया।

ना झाँका कभी, मेरे वीराने आँगन में
सरेआम ,जनाज़े से पहचान बढ़ाया।
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लौ का इठलाना तो देखो,अपनी रौशनी पर
फतिंगों के पर जलाये होंगे, पर किसी को क्या।

रोती हैं जब भी मासूम की आँखे ,टूटते इश्क पे
दर्दे अलफ़ाज़ में ऐ !ग़ालिब, ज़फर, तू ही तू नज़र आया
---'लीना '

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