Wednesday, 21 June 2017

कतरे पंखों को





         कतरे पंखों को, हर सफे में संजो   
         


             ,



कह गए , तुम्हे उड़ना ही ना आया।  

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खड़े हुए क्या हम अपनी ही जगह,
मुज़रिम सा तवज्जो आपने फ़रमाया।

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मजलिश में अफ़सोस के कतरे आँसू ,
दिखावे में कई फर्क नज़र आया। 





छालों से क्या सवाल ?  बयाँ सफ़र  का,
पत्थरों ने अबतलक जूझना ही  सिखाया।
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सन्नाटे का शोर, आ कर लौट जाती है ,
वफ़ा कहीं अकेले में होगा , कहराया।

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किसने कहा,ख़ुदा न की फर्क किसी में ,
फ़िर ज़मी आसमां में क्यों फर्क नज़र आया।
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जब भी नज़रें उठीं , तोहमत के दावेदार पर ,
दीवारे  रिश्तों का बुनियाद ही हिलता पाया।
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 ना झाँका  कभी, मेरे  वीराने  आँगन में
सरेआम ,जनाज़े से पहचान बढ़ाया।  

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 लौ का इठलाना तो देखो,अपनी रौशनी पर
 फतिंगों के पर जलाये होंगे, पर किसी को क्या।
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रोती हैं  जब  भी मासूम  की आँखे ,टूटते   इश्क पे 
दर्दे अलफ़ाज़ में ऐ !ग़ालिब, ज़फर, तू ही तू   नज़र  आया 

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---'लीना '

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