Tuesday, 14 February 2017

jeni john's poem नहीं लिख रहा

नहीं लिख रहा

नहीं लिख रहा मैं ,
कई अर्सों से , सुन रहा हूँ।
दामिनी की आग पर ,
भीगे अश्कों का गिरकर ,
रोने का स्वर, नहीं सुन रहा ,
ठंडी होती राख का ,
कुसमुसाना , सुन रहा हूँ।

नहीं लिख रहा मैं ,
कई अर्सों से , सुन रहा हूँ।
घुटते स्वांसों का राज़ ,
श्वेत क़दमों की आहट , नहीं सुन रहा ,
लहलहाते लाल फसलों की ,
सरसराहट , सुन रहा हूँ।

नहीं लिख रहा मैं ,
कई अर्सों से , सुन रहा हूँ।
खाली पेट का ,
खाली ही बजना , नहीं सुन रहा।
पानी के  घूँट का
गुडकनासुन रहा हूँ।

नहीं लिख रहा मैं ,
कई अर्सों से सुन रहा हूँ।
देश की सीमा पर ,
सर कटने  की चीख, नहीं सुन रहा।
दरवाज़े की ओट से
सुबकने का स्वर , सुन रहा हूँ। 



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