आदमी
किस्से छिड़ चुके
हैं, दरम्यान, आदमी
की
ज़ात
,
ढूंढ़ता
हर शख्स
, आदमी की ही ज़मात
I
कहकहों का
गुलज़ार
कहीं, कहकहों के बाज़ार
में
,
ढूढ़ता
सुकून, जहाँ
कहकहों
के ख़ाक बिछी
I
तकल्लुफ
में ही ऐब
थी, या शख्स को इल्म नहीं
,
ढूंढ़ता
हमदर्द अपना,
जहाँ मातम के रात मिली I
होशियारी,
तंज़ था, और था
फरेब , हर दोस्तों के शहर
,
हमने
भी काट ली हर रात,
जहाँ थी
दुश्मनों
की गुज़र-बसर।


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